युवाओं की लत के कारण… वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अमेरिकी अदालतों का सामना कर रहे हैं

युवाओं की लत के कारण… वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अमेरिकी अदालतों का सामना कर रहे हैं

हर पीढ़ी एक ऐसी तकनीक खोजती है जो बचपन को ऐसे ढंग से बदल देती है जिसकी बड़ों ने कल्पना भी नहीं की होती। जेन ज़ी और जेन अल्फ़ा के लिए वह तकनीक सोशल मीडिया है—हर जगह मौजूद, चमकती स्क्रीन पर, और ध्यान को अधिकतम करने के लिए बारीक़ी से ट्यून की गई। पिछले कुछ वर्षों में चिंता से टकराव तक तापमान बढ़ गया है, और आज यह टकराव अमेरिकी अदालतों में खेला जा रहा है। माता-पिता, शिक्षक, बाल रोग विशेषज्ञ, और राज्य अटॉर्नी जनरल ऐसे मुक़दमे दायर कर रहे हैं जिनमें आरोप है कि सबसे बड़े वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों ने ऐसी “आदत-लाने वाली” (addictive) विशेषताएँ डिज़ाइन कीं जिनसे किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को नुक़सान पहुंच सकता था—और वे यह जानते थे। प्लेटफ़ॉर्म जवाब देते हैं कि उद्देश्य संबंध और रचनात्मकता है, मजबूरी नहीं; साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और माता-पिता की ज़िम्मेदारी भी मायने रखती है। इन दोनों अवस्थाओं के बीच एक कानूनी और सांस्कृतिक टकराव खड़ा है, जो प्रोडक्ट डिज़ाइन, गोपनीयता और खुले इंटरनेट के भविष्य को आकार दे सकता है।

अदालतें क्यों—और क्यों अभी?

दस साल तक किशोरों के सोशल मीडिया उपयोग पर बातचीत एक सार्वजनिक-स्वास्थ्य सलाह जैसी लगती रही: स्क्रीन टाइम सीमित करें, सन्तुलित आदतें दिखाएँ, और डिवाइस को बेडरूम से बाहर रखें। यह मार्गदर्शन आज भी मायने रखता है। जो बदला है, वह है पैमाना और विशिष्टता। परिवारों ने देखा कि “डूमस्क्रॉलिंग” एक ख़राब आदत से रात की बाध्यता बन गई; स्कूल काउंसलरों ने महसूस किया कि चिंता और साइबरबुलिंग अपवाद नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की हवा बन गए; डॉक्टरों ने नींद में व्यवधान, बॉडी-इमेज तनाव और आत्म-हानि सामग्री का संकेत दिया। शोधकर्ताओं ने यह डेटा इकट्ठा किया कि कैसे अनंत स्क्रॉल, ऑटोप्ले, स्ट्रिक्स, पुश नोटिफ़िकेशन और एल्गोरिदमिक पर्सनलाइज़ेशन जैसे तत्व संवेदनशील उपयोगकर्ताओं को ज़्यादा देर रोके रखते हैं, अधिक क्लिक कराते हैं, और ऐसा कंटेंट दिखाते हैं जो शर्म या डर को बढ़ा देता है। उभरता कानूनी सिद्धांत यह नहीं कहता कि “सोशल मीडिया मौजूद है और बच्चे उसे इस्तेमाल करते हैं,” बल्कि यह कि “कुछ डिज़ाइन विकल्प लापरवाही या धोखाधड़ी जैसे हैं जो पूर्वानुमेय रूप से नाबालिगों को हानि पहुँचा सकते हैं।” यानी सवाल यह नहीं कि किशोरों को प्लेटफ़ॉर्म इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि क्या प्लेटफ़ॉर्मों ने ऐसे फीचर इंजीनियर किए जो विकासशील उम्र की कमजोरियों का फ़ायदा उठाते हैं।

मुख्य आरोप: डिज़ाइन, दायित्व और छल

ज़्यादातर शिकायतें तीन धुरी पर टिकती हैं। पहली, डिज़ाइन में दोष: अंतहीन फ़ीड, वैरिएबल-रिवॉर्ड (जैसे स्लॉट मशीनों की अनिश्चित जीत), ऑटोप्ले वीडियो और सोशल गेमिफिकेशन ऐसी फीडबैक लूप बनाते हैं जो युवाओं के लिए व्यसनी ढाँचे जैसा काम करते हैं। दूसरी, दायित्व में विफलता: प्लेटफ़ॉर्मों पर आरोप है कि उन्होंने सुरक्षा के बजाय एंगेजमेंट को प्राथमिकता दी—मॉडरेशन, डिफ़ॉल्ट सुरक्षा और आयु-पुष्टि में पर्याप्त निवेश नहीं किया, जबकि युवा उपयोगकर्ताओं के बीच मार्केटिंग पर ज़ोर रहा। तीसरी, भ्रामक/अनुचित प्रथाएँ: आलोचकों का कहना है कि सेफ़्टी टूल ढूँढना मुश्किल हैं या आसानी से बाइपास हो जाते हैं, “एज-एप्रोप्रियेट” लेबल वास्तविक कंटेंट के अनुभव से मेल नहीं खाते, और सार्वजनिक बयान जोखिमों को कम करके दिखाते हैं। वादी इन दावों को परिणामों से जोड़ते हैं: ईटिंग डिसऑर्डर, अवसाद, चिंता, ध्यान का खंडन, और दुखद मामलों में आत्म-हानि। प्लेटफ़ॉर्म कारण-परिणाम संबंध से इनकार करते हैं और सह-परिवर्तियों की ओर इशारा करते हैं—समग्र मानसिक-स्वास्थ्य रुझान, पारिवारिक माहौल और ऑफ़लाइन तनाव। अदालतों को सहसंबंध और कारणता को अलग करना होगा—बिना किसी को हल्का समझे।

प्लेटफ़ॉर्मों का बचाव: अभिव्यक्ति, चुनाव और प्रगति

प्रतिवादी आम तौर पर तीन स्तम्भों पर टिकते हैं। पहला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (First Amendment): उपयोगकर्ता की बात को होस्ट करना और कंटेंट की सिफ़ारिश करना संरक्षित गतिविधियाँ हैं; अदालतों को एल्गोरिदम के सर्वव्यापी सेंसर बनने से बचना चाहिए। दूसरा, उपयोगकर्ता का चुनाव: पेरेंटल कंट्रोल, कंटेंट फ़िल्टर, समय-सीमा और ऑप्ट-आउट—ये उपकरण परिवारों को अनुभव को अनुकूलित करने देते हैं, बिना व्यापक प्रतिबंधों के। तीसरा, निरंतर सुधार: किशोरों के लिए डिफ़ॉल्ट निजी खाते, बेडटाइम नजेस, रात में कम नोटिफ़िकेशन, संवेदनशील कंटेंट के लिए चेतावनी स्क्रीन और मानसिक-स्वास्थ्य संसाधनों का विस्तार—कंपनियाँ कहती हैं कि वे ट्रस्ट-एंड-सेफ़्टी में बड़े निवेश कर रही हैं, स्वतंत्र भागीदारों के साथ काम कर रही हैं, और पारदर्शिता रिपोर्ट प्रकाशित करती हैं। वे यह तथ्य भी रेखांकित करती हैं जो बहस में अक्सर खो जाता है: लाखों किशोर सोशल प्लेटफ़ॉर्मों का इस्तेमाल भाषाएँ सीखने, शौक़ खोजने, समवयस्कों से जुड़ने, सामाजिक कारणों के लिए धन जुटाने या सिर्फ़ हँसी बाँटने के लिए करते हैं। अदालत में असल विवाद यह नहीं कि मूल्य है या नहीं; विवाद यह है कि एंगेजमेंट की दौड़ नाबालिगों के संदर्भ में कानूनी सीमाएँ लाँघ गई है या नहीं।

सेक्शन 230 की एंट्री

सोशल मीडिया पर कोई मुक़दमा हो और सेक्शन 230 से टकराव न हो—ऐसा मुश्किल है। यह क़ानून प्लेटफ़ॉर्मों को अधिकांश यूज़र-जनित कंटेंट के लिए दायित्व से बचाता है। वादी 230 को “डिज़ाइन” पर फ़ोकस करके बायपास करने की कोशिश करते हैं: तर्क ये है कि पोस्ट की सिफ़ारिश करना संपादकीय कृत्य हो सकता है, लेकिन ऐसा रिवार्ड-लूप बनाना जो बच्चों को घंटों फँसाए, यह प्रोडक्ट इंजीनियरिंग है। अगर कथित हानि का स्रोत बाद वाला है, तो 230 लागू नहीं होना चाहिए। अदालतें इस भेद की सीमा पर बंटी हुई हैं। यदि डिज़ाइन-आधारित दावे टिकते हैं, तो वे प्रोडक्ट-सेफ़्टी मुक़दमेबाज़ी की उस लहर को जन्म दे सकते हैं जिसने कारों (सीट-बेल्ट, एयरबैग) और तंबाकू (चेतावनी लेबल, विज्ञापन प्रतिबंध) को बदला। अगर ये दावे गिरते हैं, तो दबाव क़ानून-निर्माताओं पर जाएगा कि वे वैधानिक सुधार करें। किसी भी हालत में “भाषण” और “सॉफ़्टवेयर आर्किटेक्चर” के बीच की बारीक रेखा इंटरनेट-क़ानून का अगला बड़ा पहेली सवाल बन रही है।

“लत” का युवाओं के संदर्भ में मतलब

“लत” शब्द भारी-भरकम है। चिकित्सकीय रूप में, स्वास्थ्य एजेंसियाँ बढ़ते तौर पर “समस्याग्रस्त या बाध्यकारी उपयोग” जैसी शब्दावली अपनाती हैं जो भारी लेकिन संभालने योग्य उपयोग से लेकर जीवन-व्यवधान पैदा करने वाली बाध्यता तक के स्पेक्ट्रम को पकड़ती है। किशोरों के लिए दाँव ऊँचे हैं क्योंकि पुरस्कार प्रणाली (reward system) तेज़ी से विकसित हो रही होती है, जबकि आत्म-नियंत्रण (executive control) बाद में परिपक्व होता है। स्ट्रिक्स (दैनिक उपयोग काउंटर), सोशल प्रूफ़ (लाइक्स, शेयर, व्यूज़) और एल्गोरिदमिक नवीनता जैसे फ़ीचर बीच-बीच में मिलने वाले पुरस्कारों (intermittent reinforcement) का निर्माण करते हैं, जो बड़ों के लिए भी कठिन हैं—किशोरों की तो बात ही छोड़िए। ऊपर से स्मार्टफ़ोन का 24/7 पोर्टल—और तूफ़ान तैयार। इसका मतलब यह नहीं कि सोशल मीडिया स्वभावतः विषाक्त है; इसका अर्थ है कि जोखिम-सतह चौड़ी है, और डिफ़ॉल्ट डिज़ाइन मायने रखते हैं। अदालतें इन व्यवहार-विज्ञान आयामों को कानूनी प्रश्नों में बदलेंगी: क्या कंपनी जोखिम जानती थी? क्या सुरक्षित विकल्प उपलब्ध थे? क्या चेतावनियाँ पर्याप्त थीं? इनके उत्तर नज़ीर (precedent) तय करेंगे।

वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म, अमेरिकी जज

भले ही प्लेटफ़ॉर्म वैश्विक हों, अमेरिकी अदालतें अक्सर मंच और मापक (bellwether) दोनों बन जाती हैं—क्योंकि कई कंपनियाँ अमेरिका-आधारित हैं और वहाँ का वादी-बार सक्रिय है। पर अमेरिका में जो होता है वह वहीं नहीं रुकता। वादियों की जीत EU डिजिटल सर्विसेज़ एक्ट (DSA), UK ऑनलाइन सेफ़्टी एक्ट और नए एज-एप्रोप्रियेट डिज़ाइन कोड जैसी व्यवस्थाओं को गति दे सकती है—डाटा मीनिमाइज़ेशन, नाबालिगों को टार्गेटेड विज्ञापनों पर लगाम, और एल्गोरिदमिक पारदर्शिता के मानक कड़े हो सकते हैं। उलट, व्यापक बचाव-जीतें प्लेटफ़ॉर्मों को अपेक्षाकृत हल्के युवा-सुरक्षा मानकों पर सामंजस्य बैठाने और प्रोडक्ट-प्रतिबंधों की जगह मीडिया साक्षरता पर ज़ोर देने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। नियामक देख रहे हैं: जब एक क्षेत्र चिंता को बाध्यकारी नियमों में बदलता है, दूसरे अक्सर “जोखिम वाले संस्करणों” की शरण बनने से बचने के लिए पीछे-पीछे आते हैं।

दबाव से जन्म लेती प्रोडक्ट रोडमैप

मुक़दमे आम तौर पर सर्वश्रेष्ठ प्रथाएँ आविष्कार नहीं करते; वे उन्हें तेज़ कर देते हैं। मुक़दमेबाज़ी, शोध और नीतिगत बहस के संयुक्त दबाव में युवा-सुरक्षा प्रोडक्ट बदलावों की अगली लहर उभर रही है:

  • गोपनीयता-सुरक्षित आयु-पुष्टि: डिवाइस मेटाडेटा और उपयोग-पैटर्न जैसे संकेत, साथ में ऐसी जाँच जो सरकारी आईडी की सार्वभौमिक माँग न करे।

  • समय-सचेत डिफ़ॉल्ट: रात के समय के लिए सख़्त सीमाएँ, स्वत: “बेडटाइम मोड,” और देर रात सिफ़ारिश-तीव्रता का क्रमिक कूलडाउन।

  • संवेदनशील कंटेंट की निरोधक परतें: आत्म-हानि, ईटिंग डिसऑर्डर, और यौन/हिंसक कंटेंट पर मज़बूत गार्डरेल; आसान रिपोर्टिंग; अधिक सुसंगत डाउनरैंकिंग।

  • एल्गोरिदमिक पारदर्शिता की खिड़कियाँ: “यह पोस्ट मुझे क्यों दिख रही है?” जैसे स्पष्टीकरण, और शोधकर्ताओं के लिए गोपनीयता-संरक्षित डेटा सैंडबॉक्स।

  • पुरस्कार-प्रणाली का पुनर्संरचना: नाबालिगों के लिए स्ट्रिक्स और पब्लिक लाइक-काउंट का महत्व घटाना; प्रो- सोशल मैट्रिक्स—जैसे रचनात्मक प्रोजेक्ट पूरे करना या शैक्षिक स्पेस में बिताया समय—की ओर बढ़ना।

ये बदलाव सभी को संतुष्ट नहीं करेंगे, और हर एक के साथ समझौते हैं। लेकिन ये “पैरेंटल कंट्रोल = वैकल्पिक ऐड-ऑन” से “बच्चे-केंद्रित डिफ़ॉल्ट = कोर अनुभव” की ओर झुकाव दिखाते हैं।

परिवारों और स्कूलों के लिए व्यावहारिक कदम—आज, अभी

जब अदालतें वैधानिक भाषा पर बहस कर रही हैं, घरों और कक्षाओं को इसी सप्ताह काम आने वाली रणनीतियाँ चाहिए। तीन ठोस कदम बड़ा असर डालते हैं। पहला, डिवाइस का भूगोल: फ़ोन किचन में चार्ज हों, बेडरूम में नहीं; नींद जीतती है। दूसरा, नोटिफ़िकेशन सर्जरी: गैर-ज़रूरी पिंग और बैज बंद; “पुल” “पुश” पर भारी। तीसरा, संयुक्त डैशबोर्ड: इन-बिल्ट टाइम लिमिट और कंटेंट फ़िल्टर का उपयोग करें, लेकिन इन्हें सज़ा नहीं, कोचिंग की भाषा में समझाएँ। स्कूल मीडिया साक्षरता (मैनिपुलेशन पहचानना), आत्म-नियमन कौशल (माइक्रो-ब्रेक, ब्रीदिंग रीसेट) और बाईस्टैंडर हस्तक्षेप (जब कोई साथी ऑनलाइन फिसलने लगे तो क्या करें) पर आधारित डिजिटल-वेलबीइंग पाठ्यक्रम लंगर डाल सकते हैं। इसके लिए किसी जज या विधानमंडल का इंतज़ार नहीं चाहिए—यह परिवार के सबसे कीमती संसाधन “ध्यान” को वापस पाने की रणनीति है।

“जीत” कैसी दिखेगी—सबके लिए

अदालती ड्रामा संघर्ष को शून्य-योग गेम जैसा बना देता है: या तो प्लेटफ़ॉर्म हारें या किशोर। बेहतर नज़र यह पूछती है कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सफलता कैसी दिखेगी। युवाओं और माता-पिता के लिए, सफलता का मतलब कम बे-नींद रातें, कम एल्गोरिदमिक खरगोश-बिल, और अधिक अर्थपूर्ण, रचनात्मक या शैक्षिक इंटरेक्शन। प्लेटफ़ॉर्मों के लिए, स्पष्ट और व्यवहार्य नियम जो सुरक्षित डिज़ाइन को पुरस्कृत करें—बिना प्रोडक्ट टीमों को परस्पर-विरोधी आदेशों में डुबोए। शिक्षकों और चिकित्सकों के लिए, ऐसा डेटा-अभिगम जो जोखिम और हस्तक्षेप का स्वतंत्र मूल्यांकन करने दे। नीतिनिर्माताओं के लिए, ऐसे क़ानून जो तकनीकी रूप से वास्तविक, संवैधानिक रूप से मज़बूत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंटरऑपरेबल हों। मुक़दमे अपने आप में यह सब नहीं दे सकते, पर वे असुरक्षित डिफ़ॉल्ट की क़ीमत बढ़ाकर और बेहतर मानदंडों की रफ़्तार तेज़ करके दिशा बदल सकते हैं।

वह आर्थिक उपकथानक जिसे नज़रअंदाज़ न करें

एंगेजमेंट कोई अमूर्त सद्गुण नहीं; यह बिज़नेस मॉडल है। जब ध्यान विज्ञापन राजस्व को ईंधन देता है, तो सत्र-लंबाई बढ़ाने वाली विशेषताओं को प्रोत्साहन मिलता है। कोई भी गंभीर सुधार—चाहे अदालतें, नियामक, या बाज़ार दबाव लागू करें—सुरक्षा को राजस्व से साधे बिना काम नहीं करेगा। यहीं सब्सक्रिप्शन टियर, संदर्भ-आधारित विज्ञापन (contextual ads), और आयु-आधारित विज्ञापन नीतियाँ तस्वीर में आती हैं। हम अधिक “युवा-मोड” देख सकते हैं, जिनमें डेटा-संग्रह सीमित हो और मोनेटाइज़ेशन तर्क अलग हो। जो प्लेटफ़ॉर्म यह संतुलन साध ले—किशोरों को गोपनीयता-सम्मानजनक, कम-बाध्यकारी, मूल्यवान कंटेंट दे—वे विश्वास और नियामकीय सद्भावना अर्जित करेंगे, जो दीर्घकालिक ब्रांड इक्विटी में बदलेगी। अधिग्रहण लागत बढ़ती और उपयोगकर्ता आधार चंचल होने की दुनिया में, भरोसा स्वयं में विकास-चैनल है।

2025 की राह: पहले अनिश्चितता, फिर स्पष्टता

अदालती कैलेंडर धीरे चलता है—मोशन, डिस्कवरी, विशेषज्ञ गवाही और अपील में साल लग सकते हैं। जब मुद्दा तात्कालिक हो, तो यह टाइमलाइन निराश करती है, लेकिन यह कठोरता भी लाती है। निकट अवधि में क्लास सर्टिफ़िकेशन (क्या वादी विशाल उपयोगकर्ता-समूह का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं?), वैज्ञानिक साक्ष्य (कौन-सी स्टडीज़ स्वीकार्य होंगी?), और प्रीएम्प्शन (क्या संघीय क़ानून कुछ दावे रोकते हैं?) पर झड़पें होंगी। अदालतों के समानांतर, राज्य और संघीय विधायक एज-गेटिंग, डिफ़ॉल्ट गोपनीयता और एल्गोरिदमिक जवाबदेही पर विधेयक लाते रहेंगे। प्लेटफ़ॉर्म सुरक्षा-अपडेट जारी रखेंगे—कभी स्वेच्छा से, कभी सहमति-आदेश (consent decree) के बाद। शोर के बीच जो संकेत मायने रखता है वह यह सांस्कृतिक मोड़ है: “बच्चों को इंटरनेट संभालना सिखाओ” से “ऐसा इंटरनेट बनाओ जो बच्चों को संभालकर रखे।” यह बदलाव एक फ़ैसले पर निर्भर नहीं करता; यह प्रोडक्ट-डॉक्ट्रिन बन जाता है।

निष्कर्ष

“युवाओं की लत के कारण… वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अमेरिकी अदालतों का सामना कर रहे हैं” महज़ एक हेडलाइन नहीं; यह एक डिज़ाइन-युग का निदान है। पिछले दशक ने बिना रुकावट वाली वृद्धि को पुरस्कृत किया और ध्यान को असीम संसाधन माना। अगला दशक स्वस्थ एंगेजमेंट का होगा—सीमाएँ, संदर्भ और रिकवरी को इंजीनियर करने का कठिन काम। परिवार रात के खाने पर स्क्रीन टाइम पर बहस करते रहेंगे। किशोर फ़िल्टरों को मात देने के नए तरीके ढूँढते रहेंगे। क्रिएटर्स नए फ़ॉर्मैट गढ़ेंगे जो डोपामिन की खनक के साथ उतरेंगे। लेकिन गुरुत्वाकर्षण केंद्र जवाबदेही की ओर खिसक रहा है। फ़ैसले 2025 में आएँ या बाद में, इन मुक़दमों की विरासत डिफ़ॉल्ट सेटिंग्स में दिखेगी: क्या डिफ़ॉल्ट रूप से लोड हो, क्या डिफ़ॉल्ट रूप से रुके, और क्या डिफ़ॉल्ट रूप से धीरे-से लेकिन दृढ़ता से बंद हो—जब उपयोगकर्ता आधी रात का 13 वर्षीय हो। अदालतें कोड नहीं लिखतीं; वे यह ज़रूर बदल सकती हैं कि “अच्छा कोड” कैसा दिखना चाहिए।


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